संपादकीय

       न्मति प्रतियोगिता विगत १७ वर्षो से प्रतियोगिता के माध्यम से सामान्य जन को धर्म ग्रंथो से जोड़ने का कार्य करते आ रही है । विगत १७ वर्षो में प्रतियोगिता २५ /३०  हजार से भी अधिक परिवारों तक पहुंच कर उन्हें स्वाध्याय परम्परा से जोड़ने में सफल हुई है |  हर वर्ष हम सभीको डाक द्वारा प्रतियोगिता पुस्तक प्रकाशित कर भेजते थे परन्तु बड़े परिश्रम के उपरांत भी अनेक लोगो का पता गलत या पूरा न होने से पुस्तक उन तक पहुँच नहीं पाती थी और वे बारबार फोन कर परेशान होते थे |  प्रतियोगिता रिझल्ट लगवाना सभी तक पहुँचाना बड़ा परिश्रम पूर्ण काम तो था ही परन्तु फिर भी हम विगत १७ वर्षो से यह कार्य सुचारू रूप से करते आ रहे है । सभी को एक साथ पत्रिका मिल जाये और पत्रिका चेक करना रिझल्ट लगाना अंक कि जानकारी सभी तक समय पर पहुंचाना अब यह सब हमने डिजिटल कर दिया है ।  प्रतियोगिता में अभी भी जुड़ने वालों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है । हम भी प्रतिवर्ष कुछ नया देने का प्रयास करते ही रहते है ।  इस बार ऑनलाइन सिस्टिम को और भी मजबूत करते हुवे सन्मति एप्लिकेशन को नया रूप दिया है ।   अब इसमें आप एक मोबाईल नंबर से एक ही पत्रिका तीनो फॉर्मेट की सबमिट कर सकते हो ।  प्रश्नों के फॉर्मेट को भी अब बदल दिया गया है हर सवाल के लिए ५-५ प्रश्न पूछे गए है और उनके लिए ६ उत्तर दिए है आपको उन ६ उत्तर में जो सही है उस पर क्लिक करना है ।  जितने भी प्रश्नों के उत्तर देना चाहो उतने देकर आप सेव करते रहे ।  लॉक अंतिम दिन सिस्टिम से ही हो जायेगा ।

      हम हर अंक में एक तीर्थंकर के जीवन चरित्र पर १० प्रश्न लेकर आते है, इस बार १५ वें तीर्थंकर श्री धर्मनाथ जी के जीवन चरित्र के आधार से १० प्रश्न बनाये है  ।  शेष तत्वार्थ सूत्र, छहढाला, प्राचीन पूजन, आदि विषयों पर प्रश्न लिए गए है ।  बड़ी प्रतियोगिता में १०  प्रश्न बाल प्रतियोगिता में ५० प्रश्न और गुरु प्रतियोगिता मे २५ प्रश्न दिए है जिनके जबाब आपको ६ ऑप्शन में से ही देने है |  प्रतियोगिता अब डिजिटल रूप में आने से सभी काम सॉफ्टवेयर द्वारा ही सम्पन्न होंगे इसलिए अधिक से अधिक पत्रिका ऑनलाइन ही जमा करने का प्रयास करे |  परन्तु जिन्हे सम्भव नहीं है वे इसकी प्रिंट निकालकर या प्रतियोगिता पुस्तक मंगवाकर उत्तर हाथ से भरकर उत्तर पुस्तिका डाक से भी भेज सकते है |  

          अंत में जिन महानुभावो ने अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग करके विजेताओं को प्रोत्साहित करने हेतु पुरस्कार प्रदान मे तथा प्रतियोगिता प्रकाशन में द्रव्य का दान दिया है वे सभी धन्यवाद के पात्र है सभी को कैवल्य की प्राप्ति हो इस मंगल भावना के साथ। ........

                                                                                                                  विधानाचार्य पं. शैलेशभाई जैन 'शैलेन्द्र' - मांगीतुंगीजी